Posted on November 21, 2018, No Comments admin

A Delhi Court has awarded two accused in the 1984 Sikh Massacre case to Death penalty and life imprisonment.  This gives us an opportunity to look back at the legacy of 1984.

1984 is one of the most remembered years in recent history.  That year will always be known as amongst the worst for Indian governance.  The year started with the Prime Minister’s Office actively conspiring to destabilise the National Conference Government in the sensitive State of Jammu & Kashmir.  An alternate Government headed by Shri Gul Mohammad Shah, who was the estranged brother in law of Dr. Farooq Abdullah proved to be disastrous.  The manipulative politics of the Prime Minister’s Office and the Congress Party was being experimented in a sensitive State.  Needless to say, it proved to be catastrophic for the State.


Anticipating elections towards the end of 1984, the Congress Party Government allowed the militancy in Punjab to go unchecked.  It wanted to strike on election eve.  The terrorist built up within the Golden Temple went unchecked.  Those, whom the Congress had created to counter the Sikh influence of Akali Dal had gone out of control.  The Operation Bluestar proved to be a historic blunder.  It was poorly planned and terribly executed.  There were no intelligence inputs with regard to the number of militants and their ammunition that they had collected within.  Many innocents got killed in the process.  But the biggest damage was both to the highly revered Sri Harminder Sahib, The Akal Takht and to the Sikh psyche.  Bluestar succeeded in hurting the psyche of India’s most patriotic community.  A myopic Government did not consider the political cost of this move.


The direct fallout of the disastrous operation in June, 1984 at the Golden Temple was the assassination of the Prime Minister.  This was one of the most unfortunate and condemnable acts in Indian history.  It also indicated a failure of governance.  The fallout of this was not anticipated.  It proved to be catastrophic.  The Congressmen led groups of mourners and protesters shouting “Khoon Ka Badla Khoon”.  This provocative slogan was shown in television on Doordarshan continuously in round-the-clock telecast.  Anti-Sikh violence started in several parts of the country.  Delhi was the worst affected.  Congressmen led violent mobs.  The Police colluded with them.  It did not fire, lathi charge or even teargas the mobs.  The rioters were given a free hand to kill and loot.  Places of worship of the Sikh community were damaged.  Sikh houses were burnt.  Their trade establishments were looted.  Thousands of innocents, men, women and children were burnt, were mutilated.  The Police did not even register the First Information Reports.


The Congress Government tried to misrepresent facts.  Civil Liberty Organisations brought a detailed report on the extent of mob violence and injustice.  The Report was banned.  The Courts refused to lift the ban.  A Judicial Commission headed by Justice Rangnath Mishra gave a clean chit to the Government to the extent that there was no collusion or failure of the Government.  Post his retirement from the Supreme Court, the Judge first became the Chairman of the National Human Rights Commission and subsequently a Congress Member of the Rajya Sabha.  The victims and the community were crying for justice.  Those Congressmen who led the mobs were made Members of Parliament and even Ministers.  There were no arrests, no prosecutions and no convictions.  The Civilised Indians and the Sikh Community developed serious doubts about our capacity to deliver Justice.  It was only stray cases in which justice could be secured.


The First NDA Government led by Shri Atal Bihar Vajpayee appointed the Justice G.T. Nanavati Commission of Enquiry.  The Commission prepared an excellent Report giving details, Police-station wise, where the accused were prima facie guilty of crimes and the status of each case.  It recommended action.  Some people were prosecuted as a result of these cases.  In two to three decades even evidence starts disappearing and evaporating.  Many witnesses had died.  Some shifted out of the country.  It was again Shri Narendra Modi Government which in 2015 appointed a Special Investigative Team (SIT) headed by Justice G.P. Mathur, a retired Judge of the Supreme Court.  The SIT detected a large number of cases where the accused were prima facie guilty but even charge sheets have not been filed.  The case in which Delhi Court yesterday has convicted two people, sentencing one of them to death was prosecuted after decades by this SIT.  Subsequently, this SIT got subsumed in another SIT headed by Justice S.N. Dhingra, a retired High Court Judge.  The subsequent SIT was appointed by the Supreme Court.

Yesterday justice has been done in one case where two accused have been punished, one with life sentence and the other with death sentence.  There are thousands of such cases which required a similar punishment in 1980s itself.  The period from 1984 to 1998 was one of cover-up where all cases were buried – as though, the 1984 genocide had not happened.  The two NDA Governments led by Shri Vajpayee and Shri Modi in which the Akali Dal led by Shri Prakash Singh Badal has been an important constituent made significant efforts to investigate the cases where evidence was still available.  Success has been achieved in one case.  The Indian society and particularly the Sikh community wants a closure of the horrible memories of 1984.  We owe to the victims that the other cases suggested by the SIT for investigation and prosecution be vigorously pursued.  The same is being done.  Such convictions in those residual cases will be a small consolation.

1984 की विरासत

दिल्ली की एक अदालत ने 1984 के सिख नरसंहार मामले में दो आरोपियों को मृत्युदंड और उम्र कैद की सजा सुनाई है। इसी बहाने हमें 1984 की विरासत की तरफ देखने का मौका मिलता है।
हाल के इतिहास में 1984 सबसे अधिक याद रखा जाने वाला वर्ष है। इस वर्ष को हमेशा भारतीय शासन के सबसे खराब दौर के रूप में याद किया जाएगा। उस वर्ष की शुरुआत प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा सक्रिय रूप से जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य की नेशनल कॉन्फ्रेस सरकार को अस्थिर करने की साजिश रचने के साथ हुई थी। जम्मू-कश्मीर में डॉ. फारुख अब्दुल्ला के बहनोई श्री गुल मोहम्मद शाह के अगुआई वाली वैकल्पिक सरकार राज्य के लिए विनाशकारी साबित हुई। प्रधानमंत्री कार्यालय और कांग्रेस पार्टी की षड़यंत्रकारी राजनीति का प्रयोग एक संवेदनशील राज्य में किया जा रहा था। कहने की जरूरत नहीं है, यह राज्य के लिए विनाशकारी साबित हुआ।

ऑपरेशन ब्लूस्टार
1984 के अंत में चुनावों को देखते हुए, कांग्रेस पार्टी की सरकार ने पंजाब में आतंकवाद को बिना किसी रुकावट के बढ़ने दिया। कांग्रेस सरकार चुनाव के ठीक पहले इसे रोकने की कार्रवाई करना चाहती थी। स्वर्ण मंदिर के अंदर आतंकवादियों का जमवाड़ा बिना रुके बढ़ता गया। कांग्रेस ने अकाली दल के प्रभाव को चुनौती देने के लिए जिनको खड़ा किया था, वही इसके नियंत्रण से बाहर हो गए। ऑपरेशन ब्लूस्टार एक ऐतिहासिक भूल साबित हुई। इसकी योजना बनाने से लेकर क्रियान्यवयन तक बहुत ही लचर रवैया अपनाया गया था। स्वर्ण मंदिर के अंदर कितने आतंकवादी हैं और उनके पास कितना गोला बारुद है, इसकी कोई खुफिया जानकारी नहीं थी। इस पूरे ऑपरेशन में कई बेकसूर लोग मारे गए। लेकिन इसमें सम्मानित श्री हरमिंदर साहिब, अकाल तख्त और सिख मानसिकता को सबसे बड़ा नुकसान पहुंचा था। ऑपरेशन ब्लूस्टार भारत के देशभक्त सिख समुदाय की मानसिकता को चोट पहुंचाने वाला साबित हुआ। एक अदूरदर्शी सरकार अपने इस कदम के राजनीतिक नुकसान का आकलन नहीं कर पाई।

अक्टूबर – नवंबर, 1984
जून 1984 में स्वर्ण मंदिर में हुए उस विनाशकारी ऑपरेशन की परणीति प्रधानमंत्री की हत्या के रूप में सामने आई। यह भारत के इतिहास का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और निदंनीय कृत्य था। इसने शासन की विफलता का भी संदेश दिया। ऐसे नतीजे का किसी को भी अंदाजा नहीं था। यह विनाशकारी साबित हुआ। कांग्रेस के लोग शोक में डूबे और गुस्से से भरे ऐसे प्रदर्शनकारियों के समूहों का नेतृत्व कर रहे थे, जो “खून का बदला खून” चिल्ला रहे थे। ऐसे भड़काऊ नारों का देश के दूर-दराज के इलाकों में दूरदर्शन के जरिए लगातार प्रसारण हो रहा था। इससे देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी हिंसा शुरू हो गई। दिल्ली इस हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित थी। कांग्रेस के लोग हिंसक भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे। पुलिस भी उनके साथ मिली हुई थी। पुलिस ने हिंसक भीड़ को रोकने के लिए ना ही गोली चलाई, ना लाठी चार्ज किया और ना ही आंसू गैस के गोले छोड़े। दंगाईयों को हत्या करने और लूट मचाने की पूरी छूट दे गई थी। सिख समुदाय के पूजा स्थलों, गुरुद्वारों को नुकसान पहुंचाया गया। सिखों के घर जला दिए गए। उनकी दुकानों को लूट लिया गया। हजारों बेगुनाह सिख पुरुष, महिलाओं और बच्चों को जिंदा जला दिया गया, उन्हें किसी लायक नहीं छोड़ा गया। पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज नहीं की थी।

कांग्रेस सरकार ने तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने का प्रयास किया। नागरिक सवतंत्रता संगठनों ने बड़े पैमाने पर भीड़ द्वारा जो हिंसा और अन्याय किया गया था, उसको लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। इस रिपोर्ट पर प्रतिबंध लगा दिया गया। न्यायालयों ने प्रतिबंध हटाने से इनकार कर दिया। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा की अगुआई वाले न्यायिक आयोग ने सरकार को क्लीन चिट दे दी और यहां तक कहा कि इस सब में सरकार की कोई मिलीभगत या विफलता नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद यह न्यायाधीश पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष बने और बाद में कांग्रेस की तरफ से राज्यसभा सदस्य बने। सिख समुदाय और पीड़ित लोग न्याय की गुहार लगा रहे थे। जिन कांग्रेसियों ने भीड़ का नेतृत्व किया था, उन्हें सांसद और मंत्री तक बनाया गया। न कोई गिरफ्तारियां हुईं, न कोई मुकदमे चले और न सजाएं हुईं। भारत के नागरिकों और सिख समुदाय के मन में न्याय देने की हमारी क्षमता को लेकर गंभीर संदेह पैदा हो गया। ऐसे छिटपुट मामले ही थे, जिनमें न्याय मिल सका था।

एनडीए की दो सरकारों की भूमिका
श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पहली एनडीए सरकार ने जस्टिस जीटी नानावती जांच आयोग का गठन किया। आयोग ने एक बेहतरीन रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें प्रत्येक पुलिस थाने से जुड़े अपराध की स्थिति और ऐसे अपराधियों का विवरण दिया गया जो प्रथम दृष्ट्या दोषी थे। नानावती आयोग ने अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की अनुशंसा की। इन मामलों के परिणामस्वरूप कुछ लोगों पर मुकदमा चलाया गया। दो से तीन दशकों में सबूत गायब हो जाते हैं और केस भी कमजोर हो जाते हैं। अनेक गवाहों की मौत हो गई और गवाहों में से कई विदेश चले गए। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने वर्ष 2015 में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस जीपी माथुर के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया। एसआईटी की जांच में बड़ी संख्या में ऐसे मामलों का पता चला, जिनमें लोग प्रथम दृष्ट्या दोषी तो थे, लेकिन उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर नहीं किए गए थे। दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार को जिस मामले में दो लोगों को दोषी करार दिया, और दोषियों में से एक को मृत्युदंड की सजा सुनाई, उस मामले में इसी एसआईटी ने दशकों बाद मुकदमा चलाया था। बाद में, जस्टिस माथुर की अगुआई वाली इस एसआईटी का हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस एसएन ढींगरा के नेतृत्व वाली एसआईटी में विलय कर दिया गया। इस एसआईटी का गठन सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया गया था।

मंगलवार को एक मामले में दो दोषियों को सजा से इंसाफ मिला, जिसमें एक दोषी को फांसी की सजा हुई और दूसरे को उम्रकैद की। ऐसे हजारों केस हैं, जिनमें 80 के दशक में ही इस तरह की सजा हो जाना चाहिए थी। 1984 से 1998 के बीच में ऐसे सारे केस बंद कर दिए गए, जैसे 1984 का नरसंहार हुआ ही नहीं था। एनडीए की दोनों सरकार- पहली श्री वाजपेयी जी की सरकार और मौजूदा श्री मोदी जी की सरकार- ने उन सभी केसों की गंभीरता से जांच कराई, जिनमें अभी भी सबूत उपलब्ध हैं। इन दोनों सरकारों में प्रकाश सिंह बादल की अगुआई वाला अकाली दल महत्वपूर्ण सहयोगी रहा है और उसने इसमें काफी मदद की है। एक केस में सफलता मिल चुकी है। भारतीय समाज, खासतौर पर सिख समुदाय, 1984 की खौफनाक यादों से छुटकारा चाहता है। हमारी पीड़ितों के प्रति ये जिम्मेदारी बनती है कि एसआईटी ने जिन मामलों की जांच और अभियोजन की सिफारिश की है, उन सबको तेजी से निपटाया जाए। और ऐसा हो भी रहा है। इन बाकी बचे मामलों में ऐसी ही सजा पीड़ितों के लिए छोटी सी सांत्वना होगी।

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